Wednesday, June 21, 2006

Majrooh's ghazal: Mujhe sahal ho gayii manzileN...

































मुझे सहल हो गयीं मंज़िलें वह हवा के रुख़ भी बदल गये
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग़ राह में जल गये

वह लजाये मेरे सवाल पर कि उठा न सके झुका के सर
उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गये

वही बात जो वह कह न सके मेरे शेर ओ नग्मे में आ गयी
वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दहे शराब में ढल गये

वही आस्तां है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं
दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहां के तौर बदल गये

तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है
तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आब्गीने पिघल गये

मेरे काम आ गयीं आख़िरश यही काविशें यही गर्देशें
बढ़ीं इस क़दर मेरी मन्ज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गये

मजरूह सुल्तानपुरी

Majrooh Sultanpuri's ghazal


Mujhe sahal ho gayii manzileN woh hava ke rukh bhi badal gaye
Tera haath haath meN aa gaya ki chiraaGh raah meN jal gaye

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